उन्मेष - समीक्षाएँ

“शब्दों,भावनाओं और प्रकृति का अनूठा कोलाज—“उन्मेष” (समीक्षक - डा0हेमन्त कुमार)


प्रकाशक: अंजुमन प्रकाशन
इलाहाबाद।
मूल्य: रू0200/- मात्र।
प्रथम संस्करण:2013

       आज की हिन्दी कविता सामाजिक सरोकारों से ज्यादा जुड़ी है। इसमें व्यवस्था का विरोध है।आम आदमी की चिन्ताएं हैं।देश,समाज,प्रकृति,पर्यावरण,राजनीति जैसे सरोकारों को लेकर वैश्विक स्तर की सोच है।और इन्हीं सरोकारों,संदर्भों और चिन्ताओं के अनुरूप ही आज की हिन्दी कविता का शिल्प,भाषा और बुनावट भी है। नई कविता की शुरुआत के साथ ही उसके शिल्प,रचनात्मकता,भाषा और बुनावट में भी तरह-तरह के प्रयोग और बदलाव होते रहे हैं। इन प्रयोगों और बदलावों का हिन्दी काव्य पर सकारात्मक और नकारात्मक दोनो तरह का प्रभाव पड़ा। सकारात्मक यह कि कविता के पाठको को नये बिम्ब,नये गठन और शिल्प की प्रयोगधर्मी रचनाए पढ़ने को लगातार मिल रही हैं। नकारात्मक यह कि काव्य से गेय तत्व क्रमशः कम होने लगा। छंदात्मक रचनाए कम लिखी जाने लगी।सपाट बयानी का पैटर्न धीरे-धीरे हिन्दी काव्य पर हावी होने लगा। लोगो में कविता पढ़ने के प्रति रुझान कम होने लगी।
                और आज हिन्दी कविता का जो परिदृश्य है उसमे उन्मेषजैसे काव्य संकलन को पढ़ना अपने आप मे एक बहुत ही कोमल और सुखद अनुभूतियों से रूबरू होना है। कनाडा में  रह रहीं युवा कवियत्री मानोशी के प्रथम काव्य संकलन उन्मेष को पढ़ना हिन्दी कविता की एक अद्भुत यात्रा से गुजरने जैसा है। एक ऐसी यात्रा जिसमें मानवीय संवेदनाएं हैं,प्रेम है,प्रकृति के विभिन्न रंग हैं,नई और ताजी अनुभूतियां हैं तो साथ ही सामाजिक सरोकार और मार्मिकता भी है।
               उन्मेष संकलन में मानोशी ने काव्य के तीन रूपों को संकलित किया है।गीत,गज़ल और छंदमुक्त कविता। इनमें भी गीत और गज़ल अधिक हैं कविताएं कम। संकलन के अंत में कुछ हाइकु,क्षणिकाएं और दोहे भी हैं।
   मानोशी  के गीतों की बात शुरू करने से पहले मैं इस बात का उल्लेख जरूर करना चहूंगा कि लगभग 2008में इंटरनेट से जुड़ने और अपना ब्लाग शुरू करने के दौरान ही मैं उनके ब्लाग मानसी तक पहुंचा था।उस समय इनकी रचनाएं भी ब्लाग पर अधिक नहीं थीं। पर इनके कुछ गीतों को पढ़ कर ही मैंने उसी समय मानोशी से कहा था कि आप की रचनाओं पर छायावाद का काफ़ी प्रभाव है। और आपकी रचनाएं पढ़ते वक्त बार-बार महादेवी जी की याद आती है।
                मानोशी के गीतों में जो नयापन,ताज़गी,प्रकृति के प्रति सम्मोहन है वह आज की युवा कवियत्रियों में कम ही दिखाई पड़ती है। उनका प्रकृति से लगाव और प्रकृति के निरीक्षण की सूक्ष्मता हमें संकलन के पहले ही गीत पतझड़ सी पगलाई धूप में देखने को मिलता है।

पतझड़ सी पगलाई धूप।
भोर भैइ जो आंखें मींचे
तकिये को सिरहाने खींचे
लोट गई इक बार पीठ पर
ले लम्बी जम्हाई धूप।
अनमन सी अलसाई धूप।
 अब धूप का पीठ पर लोटना,लम्बी जम्हाई लेना,अलसाना जैसे खूबसूरत बिंब हमारे सामने शब्दों के द्वारा सुबह के समय की धूप,सूरज---का अद्भुत कोलाज बनाते हैं। ऐसा लगता है धूप ने एक मानवीय आकार ग्रहण कर लिया हो और वह कवियत्री के समक्ष अपनी विभिन्न क्रीड़ाओं का प्रदर्शन कर रही हो।
          इसी गीत के अंतिम छंद में फ़ुदक  फ़ुदक खेले आंगन भर---खाने खाने एक पांव पर। पंक्तियों को आप देखिये आप कल्पना करिये कि धूप आंगन में एक-एक खाने पर पांव रख कर फ़ुदक रही है। जैसे बच्चे चिबड्डक या सिकड़ी के खेल में करते हैं। प्रकृति के विभिन्न रूपों,खेलों और छवियों का ऐसा अद्भुत वर्णन ही मानोशी के गीतों को अन्य युवा कवियत्रियों से अलग स्थान प्रदान करता है।
सखि वसंत आया”—गीत को अगर किसी पाठक के सामने एक अलग पन्ने पर लिखकर दिया जाय तो शायद उसे विश्वास ही नहीं होगा कि यह गीत आज की किसी युवा कवियत्री की रचना है। वह इसे निश्चित रूप से छायावादी काल की ही रचना मान बैठेगा।
   मानोशी ने अपने कुछ गीतों गर्मी के दिन फ़िर से आए,पुनः गीत का आंचल फ़हरा,संध्या आदि में जहां प्रकृति को बहुत गहराई तक महसूस करके उनका बहुत सूक्ष्म चित्रण किया है वहीं लौट चल मन,क्या यही कम है,कौन किसे कब रोक सका है,कोई साथ नहीं देता,प्रिय करो तुम याद आदि  गीतों में उन्होंने मानवीय संवेदनाओं और प्रेम की घनीभूत अनुभूतियों को अपना विषय बनाया है।मानोशी का प्रेम भी साधारण प्रेम नहीं है। वह पाठकों को हृदय के भीतर गहराई तक आन्दोलित कर जाने वाला प्रेम है।
हूक प्रेम की शूल वेदना
अंतर बेधी मौन चेतना
रोम रोम में रमी बसी छवि
हर कण अश्रु सिक्त हो निखरा
धूमिल धुंधला अंग न बदला।
उनके प्रेम में हमें विरह की वेदना सुनाई पड़ती हैहाय मैं वन वन भटकी जाऊं,तो दूसरी ओर समर्पण और पूर्णता का एक अनोखा रूप भी दिखाई पड़ता है--दीप बन कर याद तुम्हारी—”
       उन्मेष में संकलित मानोशी के तीस गीतों में हमें प्रकृति,मानवीय संवेदनाओं,अनुभूतियों और प्रेम के अनेकों इन्द्रधनुष खिलते बिखरते दिखाई देते हैं।अगर हम गज़लों की बात करें तो इसमें संकलित 21 गज़लों में हमें मानव जीवन के तमाम रंग और रूप दिखाई देते हैं।मानोशी की गज़लों की खास बात इसकी सहजता,सरलता और बोधगम्यता है।गज़लें पढ़ते समय हमें कहीं पर भी उसे समझने या उसका सार ग्रहण करने में कठिनाई नहीं महसूस होती है।
 इस संकलन में 10 मुक्त छंद,कुछ हाइकु,क्षणिकाएं और दोहे भी हैं। मानोशी की इन रचनाओं का भी सरोकार प्रकृति के निरीक्षण,प्रेम और मानवीय संवेदनाओं से ही जुड़ा है। अपनी कविता बेघर में जब मानोशी कहती हैं घुटनों से भर पेट/फ़टे आसमां से ढक बदन/पैबंद लगी जमीन पर/सोता हूं आराम से। तो अचानक ही हमें निराला की भिक्षुक कविता की याद आती है---पेट पीठ दोनों मिल कर हैं एक/चल रहा लकुटिया टेक---।
         कुल मिलाकर उन्मेष में मानोशी ने मानवीय संवेदनाओं,प्रकृति से जुड़ी अनुभूतियों और प्रेम के विविध रंगों को शब्दों में पिरोकर काव्यचित्रों का जो अद्भुत अनोखा संसार सृजित किया है वह कवियत्री के रचनाकर्म की सबसे बड़ी सार्थकता है।
          यहां एक बात मैं और कहना चाहूंगा वह यह कि यद्यपि मानोशी की रचनाएं अभी तक सिर्फ़ अपने ब्लाग मानसी और अंतर्जाल की कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में ही प्रकाशित होती रही हैं। लेकिन उन्मेष हमें इस बात के प्रति पूरी तरह आश्वस्त करता है कि मानोशी आने वाले समय में हिन्दी कविता में निश्चित रूप से अपनी एक अलग पहचान बना लेंगी।

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उन्मेष - यश मालवीय 

उन्मेष कविता संग्रह मेरे सामने है और मैं इसे काव्य के उन्मेष के रूप में ही देख रहा हूँ। संवेदना से लबरेज़, भाव बोध, समय सन्दर्भ, बदलती हुई दुनिया के रीति-रिवा़ज, रस-रंग, जमाने की चाल, विसंगतियाँ, टूटते-बिखरते मूल्य, सब कुछ एक जीते-जागते परिदृश्य के रूप में उद्घटित हो रहा है, मानोशी के पास अद्भुत एवं अप्रतिम
रचनाकार मन है, जिससे वह समय के साथ थिर ताल में लहरें उठाती हैं और कविता की सीपियाँ और मोती बटोर लाती हैं, इन सीपियों और मोतियों की चमक अनेक बार चमत्कृत करती हैं। मार्मिकता उनका सबसे प्रिय बोध है, जहाँ वह सीधे मर्म पर अनुभूति की छुअन किसी फूल की तरह रख देती है। यह रचना ख़ास तौर पर देखें -

‘‘आज फिर शाम हुई,
और तुम नहीं आये,
आसमां की लाल बिंदी,
छूने चलीं भवें क्षितिज की,
 और कुछ झोंके हवा के,
ढेरों भीगे पल ले आये,
 पर तुम नहीं आये ।’’
तुम्हारे नहीं आने का जो दर्द है, वह प्रकृति से एकरूप हो कर जैसे हर विरही मन का सच हो जाता है। यह भाव संवेदना शीर्ष कवयित्री महादेवी के मानस में सबसे अधिक साकार होती रही है, विशेषतः जब वो कहती हैं -
‘‘विस्तृत नभ का कोई कोना
मेरा न कभी अपना होना
 उमड़ी कल थी मिट आज चली
 मैं नीर भरी दुःख की बदली’’
मुझे व्यग्तिगत रूप से लगता है कि इस प्रकार के दुःख-दर्द और टीस की भी एक गरिमा होती है और इस गरिमा को कवयित्री ने रेशा-रेशा जिया है। बात अनकही शीर्षक कविता में वह कहती हैं -
‘‘हाथ थाम कर निकल पड़े हम
साथ अजाना कठिन डगर थी
कभी धूप को मुँह चिढ़ाया
कभी छाँव की पूँछ पकड़ ली
कच्चे-पक्के स्वाद निराले
आधा-आधा जिन्हें चखा था ’’
‘छाँव की पूँछ' ये अभिव्यंजना ही लगभग अभिभूत कर देने वाली है और बड़ी अपनी सी बात लगती है, जिसके लिए कभी एक शायर ने कहा था -
‘‘कहानी मेरी रुदादे जहाँ मालूम होती है
जो सुनता है उसी की दासतां मालूम होती है’’


मानोशी जी के पास कविता के विविध रंग हैं उनके पास गीत की संवेदना है, तो ग़ज़ल का व्याकरण भी है, कविता की समकालीनता है तो दोहों का रस परिपाक भी है और जापानी छंद हाइकु की सिद्धि भी है। इस प्रकार वह काव्य के सारे रंगों में सहज ही निष्णात हैं। कनाडा में रहते हुए उन्हें अपना भारत लगातार टेरता है, आवाज़ देता है। उनका काव्य मन छटपटाता है। शायद इसी छटपटाहट में ग़ज़ल का यह मतला संभव हुआ है -
‘‘कोई ़खुशबू कहीं से आती है
मेरे घर की ़जमीं बुलाती है’’
लेकिन आदमी तो आदमी ठहरा। समझौतों के साथ जी लेना कई बार उसकी नियति बनती है। जो संस्कार होते हैं वही आदतें होती हैं, जो आदतें होती हैं वही संस्कार भी हो जाते हैं। जिंदगी इनके बीच घड़ी के पेंडुलम सी डोलती है। जहाँ जिंदगी ही एक आदत हो जाए वहाँ क्या कहिएगा। अशआर आकार लेते हैं -
‘‘जिंदगी इक पुरानी आदत है
यूँ तो आदत भी छूट जाती है
आप होते हैं पर नहीं होते
रात यूँ ही गुज़रती जाती है
जाने क्या क्या सहा किया हमने
 पत्थरों पर शिकन कब आती है’’
मैं पूरी ईमानदारी से यह बात कह रहा हूँ कि मैंने इस संग्रह से गुज़र कर निश्चित ही एक समृद्धि हासिल की है। यह विश्वास है कि उन्मेष वक्त के माथे पर अपने हस्ताक्षर छोड़ जायेगा।

पुस्तक  विवरण -

उन्मेष (काव्य संग्रह - मानोशी)
पृष्ठ - ११२
संस्करण - प्रथम - २०१३ हार्ड बाउंड
मूल्य - २०० रुपये
प्रकाशक - अंजुमन प्रकाशन (इलाहाबाद)


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समीक्षा : उन्मेष  (राणा प्रताप सिंह)

इन्टरनेट जगत में सक्रिय कोई पाठक शायद ही टोरंटो, कनाडा निवासी मानोशी के नाम से अपरिचित हो| आपका काव्य संग्रह 'उन्मेष' हाल ही में अंजुमन प्रकाशन से प्रकाशित होकर आया है| संकलन में गीत, ग़ज़ल , मुक्तछंद, हाइकू, क्षणिकाएं तथा दोहा विधा में रचनाएँ है| गीत और ग़ज़ल मानोशी की प्रमुख विधाएं हैं, यह संकलन में उन्हें प्राप्त स्थान से ही 
परिलक्षित होता है|

गीतों में प्रकृति का चित्रण अत्यंत प्रभावशाली है जो उन्हें  प्रसिद्ध छायावादी कवियों की श्रेणी में ले जाकर सीधे खड़ा करता है| प्रकृति के अनछुए बिम्बों से गीतों में एक अलग ही ताज़गी का एहसास होता है| संध्या, धूप , भोर, फागुन, बसंत, गर्मी, शीत के गीतों को पढ़ते समय पाठक एक अलग ही दुनिया में चला जाता है, एक बानगी प्रस्तुत है 
बूढी सर्दी हवा सुखाती
कलफ लगाकर कड़क बनाती,
छटपट उसमे फंसी दुपहरी
समय काटने ठूंठ उगाती,
चमक रहा है सूर्य प्राण पण 
देखो हारा सा वह चेहरा| 
.
पुनः शीत का आँचल फहरा|
ठेठ दुपहरी में ज्यों काली 
स्याही छितर गई ऊपर से 
श्वेत रुई के फाहों जैसे 
धब्बे बरस पड़े ओलों के 
.
बादल को स्याही के जैसा छितरा होना लिखने के लिए प्रकृति का सूक्ष्म निरीक्षण और उन बिम्बों को गढ़ने की कला का होना आवश्यक है जिसमे मानोशी की सिद्धहस्तता है|
.
आगे के गीतों में श्रृंगार की प्रधानता है| उनके गीत अपने प्रियतम से संवाद स्थापित करते नज़र आते हैं,ये गीत सर्वस्व समर्पण की भावना , पुरानी सुधियों का तारतम्य, जीवन की तमाम विसंगतियों के मध्य प्रेम की लौ जलाए रखने की बाध्यता, मन के अन्दर की ऊहापोह आदि विषयों को केंद्र में रखकर लिखे गए हैं| मानोशी का श्रृंगार न संयोग का श्रृंगार है और न वियोग का, यह तो उनकी तरफ से एक पुकार है, एक निवेदन है, एक आशा है| कहीं कहीं पर गीतों में सूफीवाद की झलक भी दृष्टव्य है|
.
चलो आज हम 
सुनहरे सपनों के 
रुपहले गाँव में घर बसायें 
तुम्हारी आशा की राहों 
पर बांधे थे खाबों से पुल 
आज चलो उस पुल से गुजरें
और क्षितिज के पार हो जाएँ|
.
दीप बनाकर याद तुम्हारी, प्रिय मैं लौ बनकर जलती हूँ|
प्रेम थाल में प्राण सजाकर, लो तुमको अर्पण करती हूँ
 .
वह अपरिचित स्पर्श जिसने 
छु लिया था इस ह्रदय को 
अनकही सी कई बातें 
खोल जाती थी गिरह जो
और तब से प्रेम हाला
जाम भर भर पी रही हूँ|
.
मानोशी की काव्य यात्रा में वतन से दूर होने का दर्द भी उभर कर आया है, देश की माटी छोड़कर आने पर उनका मन टीसता है, बार बार उद्वेलित करता है, मातृभूमि का प्रेम सहज ही इन पंक्तियों से प्रस्फुटित होता है
.
सीमाएं तज ,
भटक भटक कर
थका चूर है,
घर सुदूर है,
श्रांत मन, चल शांत हो
अब लौट चल घर
.
घर विदेश, स्वप्न देश
चमक-दमक, भिन्न वेश,
दूर हुआ, प्रिय स्वदेश,
हिय घिर घन छाया,
फिर फागुन आया
.
कोई खुशबू कहीं से आती है 
मेरे घर की ज़मीं बुलाती है
संकलन के दूसरे खंड में ग़ज़लों को स्थान दिया गया है| कहते हैं कि जब कोई सिद्धहस्त गीतकार गजलें लिखता है तो उसका गीतकार ग़ज़लों पर हावी हो जाता है और इसी प्रकार जब कोई शायर गीत लिखता है तो उसके गीतों में ग़ज़ल का अंदाज़ अनचाहे ही आ जाता है| परन्तु मानोशी इस मान्यता को तोड़ती हुई अपनी ग़ज़लों को लेकर दृढ़ता के साथ खड़ी नज़र आती है| गज़ल विधा संकेत की भाषा बोलती है और गीत बिम्बों और प्रतीकों की पटरी पर चलते हैं| ग़ज़ल मासूमियत के साथ सवाल पूछती है और खुद ही उत्तर भी देती है| ग़ज़ल को साफगोई पसंद है, किसी भी तरह की बनावट ग़ज़ल को ग़ज़ल नहीं रहने देती| मानोशी की साफगोई देखिये
.
ये जहां मेरा नहीं है 
या कोई मुझ सा नहीं है 
.
मेरे अपने आईने में 
अक्स क्यों मेरा नहीं है 
.
मानोशी की ग़ज़लों में आज के दौर में कही जा रही ग़ज़लों की तरह ज़माने की फ़िक्र भी नज़र आती है 
.
यूँ तो मेहमां बनकर आये थे वो मेरे घर मगर
जाते जाते मुझको मेरे घर में मेहमां कर गए 
.
टूटते रिश्तों में पलता टूटता बचपन यहाँ 
राह में भटकी जवानी गोली ही बरसायेगी 
.
ग़ज़लों में अगर मिटटी की सोंधी खुशबू मिल जाए तो क्या कहने, मानोशी के कुछ अशार देखिये 
.
नई है मिटटी मन सोंधा है 
कटती जुडती सी कड़ियाँ हैं
तेरा प्यार से गाल चिकुटना
छोटी छोटी सी खुशियाँ हैं 
.
रातों को तेरी यादों से 
लुकछुप मिलती दो सखियाँ है
.
संकलन में और भी कई बेशकीमती गज़लें हैं, मेरे इस कथन की पुष्टि आप तब करेंगे जब आप संकलन स्वयं पढेंगे|
संकलन के अन्य खण्डों में मुक्तछंदों, हाइकु तथा दोहों को स्थान दिया गया है|
.
जहां उन्मेष की भूमिका में प्रख्यात नवगीतकार यश मालवीय लिखते हैं कि इस संकलन से गुज़रना उनकी व्यक्तिगत उपलब्धि रही है तो जाने माने शायर एहतराम इस्लाम का मानना है की मानोशी के कई अशआर ज़माने की जुबां पर चढ़नें की हैसियत रखते हैं|
.
मैं इस संकलन को अपने पुस्तकालय में अग्रिम पंक्ति में स्थान देना पसंद करूंगा|
पुस्तक की आकर्षक छपाई , नयन सुलभ फॉण्ट, उत्तम किस्म का कागज़ तथा प्रूफ की कोई भी गलती का न होना इस संकलन को उच्चतम स्तर प्रदान करते हैं, जिसके लिए अंजुमन प्रकाशन बधाई के पात्र हैं|
.
पुस्तक का विवरण इस प्रकार है|
.
उन्मेष (काव्य संग्रह - मानोशी)
पृष्ठ - ११२ 
संस्करण - प्रथम - २०१३ हार्ड बाउंड 
मूल्य - २०० रुपये 
प्रकाशक - अंजुमन प्रकाशन (इलाहाबाद)
.
समीक्षक
राणा प्रताप सिंह

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साहित्यिक अंजुमन में मानोशी का उन्मेष = बृजेश नीरज

 कविता सिर्फ भावाभिव्यक्ति नहीं होती बल्कि वह कवि की दृष्टि और अनुभूतियों से भी पाठक का परिचय कराती है। रचना में कवि का अस्तित्व तमाम बंधनों को तोड़कर बाहर प्रस्फुटित होता है। उसके द्वारा चुने गए शब्द उसके भावों को जीते हैं और उस चित्र को साक्षात पाठक के समक्ष जीवंत करते हैं जो कहीं दूर उसके मन के भीतर 
रचा-बसा और दबा होता है।
      छत्तीसगढ़ के कोरबा शहर में जन्मी और वर्तमान में कनाडा में रह रही नवोदित रचनाकार मानोशी का अंजुमन प्रकाशन, इलाहाबाद से प्रकाशित कविता संग्रह ‘उन्मेष’ मुझे प्राप्त हुआ। बंगाली साहित्य ने उन्हें साहित्य के प्रति प्रेरित किया। गायन में संगीत विशारद की उपाधि प्राप्त चुकी मानोशी के गीतों में उनका संगीत ज्ञान स्पष्ट परिलक्षित होता है। गीतों में उनकी पकड़ इतनी सशक्त है कि भाव स्वयं शब्द का रूप लेकर अभिव्यक्त हो जाते हैं। यह उदाहरण देखें-
‘इक सितारा माथ पर जो, उमग तुमने जड़ दिया था
और भॅंवरा रूप बनकर, अधर से रस पी लिया था
उस समय के मद भरे पल, ज्यों नशे में जी रही हूँ
      उन्मेष में संग्रहीत 30 गीतों, 21 गज़लों, 10 मुक्तछंद, 8 हाइकू रचनायें, 6 क्षणिकाएं और दोहों में कवियित्री के सृजन की विविधता के रंग बिखरे हैं। सभी विधाओं में इनकी कलम बहुत ही मजबूती से चली है। उन्हें विषयों के लिये श्रम नहीं करना पड़ता। अपने आस-पास के अनुभवों की उनके पास ऐसी विरासत है जो सहज ही उनकी रचनाओं में व्यक्त हो जाती है। विद्रुपताओं को भी उन्होंने एक सुन्दर रूप दिया है। वे कोई घिसा-पिटा मुहावरा लेकर नहीं चलतीं। उन्होंने प्रकृति की निकटता में जीवन की सच्चाइयों को बहुत ही सहजता से स्वीकार किया है। उनकी अनुभूतियों का पटल बहुत ही विस्तृत है। प्राकृतिक अनुभूतियों से लेकर जीवन की सूक्ष्मतम संवेदनाओं और दर्शन का स्पर्श पाठक को इनकी रचनायें पढ़ते समय होता है।
      प्राकृतिक सौंदर्य को जिस खूबसूरती से उन्होंने उकेरा है, उतनी गहनता और संलग्नता बहुत कम देखने को मिलती है। जैसे कोई चित्रकार कैनवास पर दृश्यों को उकेरता है, वही कार्य मानोषी ने अपनी कलम से किया है-
भोर भई जो आँखें मींचे
तकिये को सिरहाने खींचे
लोट गई इक बार पीठ पर
ले लम्बी जम्हाई धूप
      उनकी रचनाओं में भाषा और शिल्प सहज है। उनमें भाषा को लेकर विशेष आग्रह नहीं दिखता। सहजता से आए शब्द रचना के अंग हैं जो पाठक को अनुभूतियों के संसार में विचरण करने में सहायक हैं। प्रवाह में कोई भी शब्द बाधक नहीं बनता। सहज भाषा, सार्थक प्रतीकों और बिम्ब प्रयोगों ने रचनाओं की सम्प्रेषणीयता में वृद्धि की है। ये पंक्तियाँ देखें-
सन्नाटे की भाँग चढ़ाकर
पड़ी रही दोपहर नशे में
एक चटखारेदार उदाहरण और देखें-
खट्टे अंबुआ चख गलती से
पगली कूक कूक चिल्लाये
      रचना में किसी पंक्ति की शुरूआत यदि कारक से की जाए तो आभास यह मिलता है कि किसी वाक्य को तोड़कर दो पंक्तियाँ बना दी गयी हैं। खासकर, गीतों में इससे बचने का प्रयास जरूर करना चाहिए लेकिन लेखन की सतत प्रक्रिया में इस तरह की चीजें रह ही जाती हैं-
नंगे बदन बर्फ के गोलों
में सनते बच्चे, कच्छे में
      भाव संप्रेषण इनकी विशेषता है लेकिन कहीं-कहीं भाव उस तेजी से नहीं पहुँचते। पाठक को रूकना पड़ता है, ठहरना और सोचना होता है।
छटपट उसमें फॅंसी दुपहरी
समय काटने ठूँठ उगाती
      अनुभूतियों के विविध आयामों को जिस तरह उनकी रचनाओं में स्थान मिला है वह उनकी रचनाओं और इस संग्रह की उपलब्धि है। उनकी रचनायें तार्किकता के आधार पर बजबजाती भावुकता को अपने से दूर धकेलती हैं। मिथकों को नकारते हुए उन्होंने जीवन के सत्य को स्वीकारा है-
छूटे हाथों से खुशी, जैसे फिसले धूल।
ढूँढा अपने हर तरफ, बस इतनी सी भूल।
उनकी छंदमुक्त रचनायें सीधे बात करती हैं, बिना कोई ओट लिए-
घुटनों से भर पेट
फटे आसमाँ से ढक बदन
पैबंद लगी जमीं पर
सोता हूँ मैं आराम से।
      भीतर की पीड़ा को उन्होंने अपनी रचनाओं में प्रतिष्ठित कर समाज को दिशा देने की सफल चेष्ठा की है। जीवन के अस्तित्व के सवाल को बहुत खूबी के साथ उनकी रचना में उकेरा गया है। यथार्थ से परिचित कराती उनकी ये पंक्तियाँ-
वो आखिरी बिंदु
जहाँ ‘मैं’ समाप्त होता है
‘तुम’ समाप्त होता है
और बस रह जाता है
एक शून्य।
आओ उस शून्य को पा लें अब।
जीवन के विभिन्न पहलू उनकी रचनाओं में बहुत प्रमुखता से उभरे हैं-
तेरा मेरा रिश्ता क्या है
दर्द का आखिर किस्सा क्या है
उनका दर्द जब बयां होता है तो अपना सा लगता है। यह उनके रचनाकर्म की सशक्तता है।
कहीं बहुत कुछ भीग रहा था।
हर पंखुड़ी पर जमा थीं कई
पुराने उघड़े लम्हों की दास्ताँ,
एक छोटा सा लम्हा टपक पड़ा
मानोषी संघर्षों के सत्य को स्वीकारते हुए भी जीवन के प्रति सकारात्मक हैं।
कुछ मिले काँटे मगर उपवन मिला
क्या यही कम है कि यह जीवन मिला?
एक और उदाहरण देखें
दो क्षण के इस जीवन में क्या
द्वेष द्वंद को सींच रहे हो
सबसे कठिन दिनों के एकाकीपन को कितनी सुन्दरता से शब्द मिले हैं-
जब माँगा था संग सभी का
तब कोई भी साथ नहीं था
अब देखो एकांत मनाने जग-उन्माथ नहीं देता है
अपने को पहचानने की छटपटाहट उनकी रचनाओं में भी मुखरित हुई है-
और अकेले जूझती हूँ,
पहनती हूँ दोष,
ओढ़ती हूँ गालियाँ,
और फिर भी सर ऊँचा कर
ख़ुद को पहचानने की कोशिश करती हूँ
      प्रकृति के सानिध्य में पकी और जीवन को करीब से जीती मानोशी की रचनायें पाठक को एक सुखद अनुभव दे जाती हैं।
                                                                               -  बृजेश नीरज
                                                                  (मौलिक व अप्रकाशित)
!! पुस्तक विवरण !!
कवियत्री - मानोशी
प्रकाशन वर्ष - 2013
ISBN - 13 - 9788192774602
पृष्ठ संख्या - 112
बाईंडिंग - हार्ड बाउंड
प्रकाशक - अंजुमन प्रकाशन,  इलाहाबाद

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