उधेड़बुन

''उधेड़बुन''........अतुकांत काव्य संग्रह



श्री राहुल देव भार्इ का काव्य संग्रह उधेड़बुन किसी परिचय का मोहताज नहीं है। इसलिए इस पर किसी भूमिका के बगैर ही हम सीधी बात करते है। श्री राहुल भार्इ अपनी कविताओं में स्वयं से संवाद करते हुए विचारशील दृषिटकोण पाठक के सामने रखते है। इनकी वैचारिक भाषा जनसामान्य की है, जिसमें देशज, आम बोलचाल, उर्दू व अग्रेंजी शब्दों के साथ ही साथ अपनत्व जैसे तू, तेरे आदि शब्दों का भी प्रयोग स्वच्छंदता से किया है। इन्होने अपनी संवाद शैली में कहीं कहीं तुकांतता व प्रचलित विधा को पकड़ने की कोशिश करके कविता को और भी सशक्त बनाया है। हां, कहीं कहीं चूक वश व्याकरण व गेयता बाधित लगी है, जो नगण्य के सामान। फिर भी इस पर ध्यान दिया जाना आवश्यक है।
श्री राहुल भार्इ कोर्इ कविता नहीं लिखते हैं बल्कि वह तो आपसे आत्मा की आवाज बनकर कोरे कागज पर शब्द क्रम में स्याह हो जाती है। आप अपनी आत्मा से बात करते हुए कहते है- 

मेरे अंतस के दोषों मेे
श्रम प्रसूति सपर्धा से
बनूं मैं पूर्ण इकार्इ जीवन की
गूंजे तेरा निनाद उर में हर क्षण..।
.....इनकी कविता स्वयं से बातें करती हुर्इ मन मुग्धा सी हैं-
चूल्हे की दो मोटी रोटिया
और तनिक नमक के साथ
लोटा भर ठण्डा पानी
तुम्हारे आगे रखा है....।
........सपने से उगी कविता और उगे सूरज के लाल आंखें तरेरने तक मधुर कलरव धुन सी कविता हृदयपटल पर छपकर मस्तिष्क में गूंजती रहती है-
जो ढूंढ़ता हूं मैं किताबों में
वह मिलता नहीं
आदमी की असलियत
-----जो दिखता नहीं है.....।
.....ओह कामना बहि्र मौन व्यथा चिन्तन में खोया मन ...क्या मिला?..कविता नायक तुम डरे हुए हो विश्व नर से ऐसा क्या है....?
है विजन मरूभूमि सा
प्रयास कर तू हो मगर.....

कवि अपने अंतस की समस्त उदगारों को उड़ेलना चाहता है, यही कौतुक भी है......। जिस कर्म का लिलार गीता में लिखा है, सफल है। वह जीव जो रस भूल गया और याद रखता है, बस एक मात्र र्इश...। यही इस मन: द्वार का धीश है। राहुल भार्इ की कविता नवजीवन में तन के बीज से अंकुरित नि:शेष है-वह वट वृक्ष सा विस्तार, सघन, शीतल, नीड़, आश्रम तप आदि जैसा ही दृश्य का प्रसार है।

'अन्तद्र्वन्द' 'प्रतीक' पूंछ कर सदैव सेज पर आराम करती वह ओंस की बूंद को परख कर पाप रहस्यों की पोल खोलती हुर्इ आगे बढ़ जाती है। पथिक भ्रमित न होना बच्चे और दुनियां अपनाकर टेढ़ी मेढ़ी पगडंडियों पर जीवन में कांटे भी फलते हैं। सिर्फ कविता के लिए सौंदर्य आधा सच जैसे इस कलियुग में अब जो दंगल..बकरी बनाम शेर..ही फबता है। वर्तमान के सामाजिक परिवेश में तमाम विकृतियां झाड़ के समान फैली हुर्इं हैं। जिन्हे स्वयं की सुविधा के लिए अपनाकर समृध्द जीवन का मुखौटा पहन कर खुले आम समाज में विचरण कर रहे हैं, का नाकाब उतारने हेतु ही... 'भ्रष्टाचारं उवाच..! अक्स में मैं और मेरा शहर जिसमें कविता और कविता दो बहने हैं। एक हारा हुआ आदमी जो स्वयं के असितत्व से दो-दो हाथ करता हुआ अनिशिचत जीवन: एक दशा दर्शन के झरोखों से झांकता, फुफकारता हवाओं का रूख बदलने में अथक प्रयासरत के फलस्वरूप वह सफल भी है।

मेरे मन के अन्त:स्थल के प्रेम पथ का पथिक निस्वार्थ रह कर अनितम इच्छा को संजोए पथ पर आरूढ़ हुआ है। इस जीवन से उपजे जटिल से जटिलतम प्रश्नो के उत्तर बूझता है-नशा अपराधी सज्जनों के लिए और तुम कौन शीर्षक से अपृच्छ प्रश्न...दुर्जन हो क्या? ...मेरे सृजक तू बता ये दुनिया ये जिन्दगानी एक टुकड़ा आकाश मेरे लिए क्या रेत है? कवि के हृदय को बखूबी स्पष्ट करती है। राजस्थान की एक लड़की शहर की सड़़कें महाप्रलय क्या बचा? कवि ने प्रत्येक विषय पर खूब सोच विचार कर लिखा है-अनहद नाद गांव से शहर तक कवि क्या ऐसा होता है!

जहां देखो जिस पथ पर चलो, बस। परिवर्तन के चौराहे हैं। पग-पग पर सैकड़ों मार्ग दर्शक, दिशा सूचक पट लिए खड़ें हैं। जीवन की यही नियति भी हैै। मानव और मानवता तो रही नहीं, बस। जिधर भी नजर घुमाओं सियासी दलों के झण्डे एक दो नही बल्कि झुण्डों में दलदल में गड़े हुए हैं। किस दल का झण्डा कितने गहरे दलदल में फसा हुआ है अनुमान लगाना भी कठिन है। किस दल का झण्डा मेंरा है, मैं भूल चुका हूं। बस इन सब का प्रतिउत्तर-एक आसक्ति की स्वीकारोक्ति से मिल जाता है।

समीक्षा की समय सीमा समाप्त होती है। ----समालोचना के क्षेत्र में पधारने के लिए धन्यवाद।
हार्दिक साभार सहित-  गडढा मुक्त----- पुस्ता चुस्त,  कविताओं की प्रस्तुति हेतु आपको ढेरों शुभकामनाओं सहित-साधुवाद व हार्दिक बधार्इ। आशा करता हूं कि आपकी आत्मा की आत्मा से बातें करने वाली सिलसिलेवार कविताओं का संग्रह पुन: पुन: प्राप्त होता रहेगा। सादर, 

शुभ-शुभ!

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[समीक्षित पुस्तक : उधेड़बुन (कविता संग्रह)। लेखक : राहुल देव। प्रकाशक : अंजुमन प्रकाशन, इलाहाबाद। प्रकाशन वर्ष : 2014 । पृष्ठ - 112 । मूल्य: 20 /-]

‘उधेड़बुन’ राहुल देव का पहला कविता संग्रह है | श्री देव हिंदी साहित्य के एक उदीयमान कवि हैं | किशोरावस्था में ही रचित यह साहित्य कवि की साहित्यिक प्रतिभा को सिद्ध करने में पूर्णतः समर्थ है | 

प्रस्तुत कविता संग्रह की कविताएँ कवि की प्रारंभिक रचनाएँ होने पर भी अपने कथ्य एवं शिल्प की दृष्टि से उत्कृष्ट हैं | आपके पास शब्दों का विशाल भण्डार है | इस संग्रह की रचनाओं में आपके व्यापक दृष्टिकोण एवं भावानुवर्तिनी भाषा का दिग्दर्शन प्राप्त होता है | प्रस्तुत संकलन में कवि ने अपने आस-पास के परिवेश के प्रभाव, अपनी संवेदनाओं की सच्चाई और हृदय के भावों को अपनी 49 कविताओं के माध्यम से प्रस्तुत किया है | कवि द्वारा अपनी काव्य यात्रा की चिंतनधारा में जीवन के कटु एवं तिक्त अनुभवों को बड़ी बारीकी से विश्लेषित करते हुए जन-मानस तक पहुंचाने का प्रयत्न किया गया है | आत्मबोध में डूबा हुआ कवि का किशोरवय मन अन्याय तथा कदाचार का विरोधी है | वह अव्यक्त परमेश्वर से साक्षत्कार करने का इच्छुक है | जीवन की गतिशीलता कवि के दार्शनिक दृष्टिकोण को व्यक्त करती है | यहाँ तक कि उसे ओस की एक छोटी सी बूंद में भी अनंत संभावनाएं नज़र आने लगतीं हैं | बूँद को जीवन की गति का प्रतीक बताते हुए कवि का कथन है- ‘बूँद / पूर्ण है स्वयं में / समेट सकती है विश्व को / स्वयं में /.................../ओस की वह बूँद / प्रतीक है जीवन का / गति का !’ 

सामजिक विद्रूपता का एक चित्र दृष्टव्य है- ‘मैं शक्ति हूँ / प्रदूषण व् वैमनस्य से / क्षीण हो, विश्राम चाहती हूँ / इस गंदगी को देख / बहुत मैं ऊब गयी हूँ / हाँ शक्ति होकर भी अब मैं / दुर्बलता का प्रतीक बन गयी हूँ !’ 

दिनोंदिन बढ़ते हुए पाप और अत्याचारों को देखकर कवि हृदय कह उठता है – ‘हाय ! यह कैसा जगत दर्शन / जहाँ होता राक्षसी नर्तन / ले चलो मुझे यहाँ से / दूर कहीं / जहाँ हों निर्विकार, मिले शांति / बच सकें, सबके प्राण!’ 

सधी हुई भाषा तथा भावप्रवण अभिव्यक्ति कवि की निजी विशेषता है | जिसका यह उदाहरण उदृत करने का मैं लोभ संवरण नहीं कर पा रहा हूँ, देखिये- ‘गूंजे तेरा निनाद / उर में हर क्षण / विश्वानुराक्त / तम दूर करो इस मन का / अंतर्पथ कंटक शून्य करो / हरो विषाद, दो आह्लाद / मैं बलाक्रांत, भ्रांत, जड़मति / विमुक्ति, नव्यता, ओज मिले / परिणीत करो मेरा तन-मन / मैं नित-नत पद प्रणत / निःस्व तुम्हारी शरणागत !’ 

संग्रह की अंतिम कुछ कविताओं में कवि ने व्यंग्यविधा का भी अच्छा सम्मिश्रण किया है- ‘यहाँ आदमी / जो सोचता है वो करता नहीं / और जो सोचता है वो करता नहीं / .../ छुटपन में सोचे गये सपने / टूट जाते हैं भुंजे हुए पापड़ के समान / और हम उन्हें चबा जाते हैं / समय की चटनी के साथ .......’ 

इस प्रकार प्रस्तुत संग्रह की समस्त कविताएँ कवि के प्रभावी एवं काव्यात्मक भाषा विन्यास से युक्त सृजन की ऊँचाई को सिद्ध करने में सक्षम हैं | मुझे विश्वास है कि राहुल देव की इस कृति का हिंदी साहित्य जगत अत्यंत हर्ष एवं उत्साह के साथ स्वागत करेगा ! 

[समीक्षक : डॉ राजेश कुमार पाण्डेयवरिष्ठ प्रवक्ता- हिंदी विभागआनंदी देवी इंटर कॉलेज, सीतापुर, उ. प्र. ]



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अँधेरे से बाहर उम्मीद और रौशनी की कवितायेँ
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‘उधेड़बुन’ हर सजीव प्राणी के अन्दर कभी न कभी अवश्य होती है | छोटे लोगों के पास अपनी छोटी उधेड़बुनें हैं तो बड़े बड़े लोग बड़ी बड़ी उधेड़बुनों में लगे हैं | इस क्रम में युवा कवि राहुल देव का आया पहला कविता संग्रह ‘उधेड़बुन’ शैशव से लेकर युवाकाल तक की तमाम चिंताओं का चित्र देती है | इस कविता संग्रह को हाथ में लेते ही सर्वप्रथम शीर्षक पर ही मेरी निगाह ठहर गयी, शीर्षक अपने अर्थों में व्यापक है क्योंकि आज के इस कठिन समय को देखते हुए मनुष्य की दुश्चिंताओं के अन्दर चलने वाली यह एक अनवरत प्रक्रिया है | ठीक इसी प्रकार किशोरावस्था में रची गयी ये कवितायेँ जबकि कवि स्वयं को किसी निश्चित बिंदु पर ठहरा हुआ नहीं पाता तब उसकी कविता अपने आंतरिक और बाह्य संसार से जूझकर अपनी एक अलग राह स्वयं निर्मित करती है | राहुल अपने प्रारंभ से ही चीज़ों को ‘उधेड़ते’ और ‘बुनते’ रहे हैं और ऐसा मैं निश्चित रूप से इसलिए भी कह पा रहा हूँ क्योंकि मैं इस कवि के जन्म से लेकर अब तक के निजी जीवन का साक्षी रहा हूँ |
इस संग्रह की पहली कविता व्यष्टि को समष्टि में तिरोहित करती दिखाई देती है | तो संग्रह की दूसरी ही कविता एक लम्बी कविता है | ‘छद्मावरण’ शीर्षक से इस लम्बी कविता में जीवनानुभूति का विडंबनात्मक, व्यंग्यात्मक चित्र है | पूरी कविता से गुजरने के बाद लगता है कि कवि में चरित्र चित्रण और चरित्र के अंतर्द्वंध की गहरी पहचान है | यह कविता यथार्थ का कटु व सजीव अभिव्यक्तिकरण है | एक लम्बी छन्दमुक्त कविता में निरंतर एक व्यक्ति के अंतःकरण और बाह्य जीवन का द्वंद्व चित्रित करना कवि की एकाग्रता और सघन अध्ययन का परिणाम है | इस कविता को पढ़ते हुए अपनी कुछ पंक्तियाँ याद आती हैं, “पैरों में पादुका पहन कौन जान सका-/ धूल गर्म होती है कौन पहचान सका/ क्षुधा तृप्त होने पर भूख एक संभ्रम है/ असफल व्यक्तियों की पीर कौन जान सका ?” इस एक कविता में दूसरा जन्म भी ले आना केन्द्रीय चरित्र का चरित्र चित्रण की शक्ति और वर्णनात्मक क्षमता से युक्त है राहुल की कलम | थोड़ा ध्यान से पढ़ने पर मुझे तीन जन्मों की कथा मिलती है एक कवि चरित्र की | एक कविता में तीन जन्मों का लेखा-जोखा कम शब्दों में सिद्ध करता है कि कविता में सूक्ति शक्ति का सफल प्रयोग हुआ है | कविता के अंत में किया गया व्यंग्य तीखा है तथा धर्माधीशों को चुभेगा जब कवि लिखता है कि, “प्रसाद रुपी मिष्ठान्न/ तुम्हें सिर्फ सुंघाया गया/ तुम कुछ नहीं कर सकते थे/ लार घोटने के सिवा” |
अगली कविता ‘सपने की बात’ को भी एक लम्बी कविता की श्रेणी में रखा जा सकता है | इस कविता में कवि अपने व्यक्तिगत जीवन की समस्याओं का समाधान सपनों में पाता है | सपनों की यह दुनिया बड़ी रूमानी है और यथार्थ से संपृक्त भी | इस कविता में वह सपनों के माध्यम से रोमांस, विवाह और देहान्तरण जैसे विषयों को एक साथ पिरो ले जाता है | ‘पतझड़ के बाद’ शीर्षक कविता इस संग्रह की एक दार्शनिक कविता है | विद्वानों का मत है कि हर दार्शनिक कवि नहीं होता लेकिन हर सच्चा कवि दार्शनिक होता है | उम्र के जिस दौर में यह कवितायेँ रची गयी है अपने भरपूर अनगढ़पन को लिए हुए कहीं कहीं हमें सहसा चकित भी करती हैं | मुझे तो लगता है कि शायद कवि को खुद भी भान नहीं रहा हो कि कई जगहों पर वह कितनी बड़ी बात कर गया है | कविताओं में भाव और विचारों का अद्भुत संतुलन है |
जहाँ ‘ओह कामना वह्नि’ कविता को पढ़ते हुए दिनकर की पंक्तियाँ याद आती हैं, “कामना वह्नि की शिखा/ मुक्त मैं अनवरुद्ध/ मैं अप्रतिहत, मैं दुर्निवार !” वहीँ ‘मौन व्यथा’ शीर्षक कविता में, “अरे यायावर !/ तू महान है/ तेरी व्यथा, तेरी ख़ुशी/ रूप में सब कुछ की तरह/ समाई सारतत्व गीता की तरह...” लिखकर कवि ने नवीन उपमान का प्रयोग किया है | ‘चिंतन’ शीर्षक कविता में राहुल एक दार्शनिक की तरह संसार और अंतर्जगत को देखते हैं | बचपन, किशोरावस्था और युवाकाल की भूमि तक आते आते ऐसी गद्यात्मक कविताओं की रचना संकेत करती है कि राहुल को भविष्य में अच्छा गद्यकार बनने की पूरी सम्भावना है | संग्रह में आगे की तमाम कविताओं को पढ़ते हुए यह भी लगा कि राहुल के अन्दर के आलोचक को समझने के लिए बुद्धि प्रधान अध्ययन आवश्यक है पाठक के लिए क्योंकि कहीं कहीं पर राहुल का वैचारिक गुम्फन बहुत जटिल है, उन्हें समझने में ‘वाक्यं रसात्मकं काव्यम’ सहायता नहीं करता है | राहुल इस बौद्धिक युग के बौद्धिक कवि हैं जिसने अपने जीवनानुभवों और अपने प्रतिसंसार को अपनी इन कविताओं में उतारा हैं |
आज की काव्यभाषा में कहें तो एक आध्यात्मिक अभिव्यक्ति है ‘विश्वनर से’ शीर्षक कविता तो ‘कर्म’ शीर्षक कविता में कर्म की सहज अभिव्यक्ति की गयी है कर्मकार के चरित्र से जो किसी भी देश की वास्तविक शक्ति होता है | ‘नवजीवन’ में कवि एक नूतन संसार की कल्पना में रत है | यहाँ पन्त की पंक्तियाँ याद आती हैं, “अये विश्व के स्वर्ण स्वप्न- संसृति के प्रथम प्रभात !” ‘अंतर्द्वंध’ कविता में सच्ची मनुष्यता की तलाश दिखलाई पड़ती है | ‘प्रतीक’ अपने आप में एक प्रतीकात्मक शब्दचित्र है तो एक नारी मन का, उसके जीवन की विडम्बनाओं का शाब्दिक चित्र है ‘सेज’ | ‘ओस की वह बूँद’ व्यष्टि से समष्टि’ के बीच रिश्ते को व्यक्त करती है और लघुता की निजता में पारावार की विराटता के दर्शन देती है | ‘परख’ कविता कहती है कि चीज़ों को ज्यादा परखते परखते मनुष्य अपना उद्देश्य भूल बैठा है | एक शायर कहता है, “परखना मत परखने से कोई अपना नहीं रहता/ किसी भी आईने में आपका चेहरा नहीं रहता |” ‘पाप’ कविता पर अमर उपन्यासकार भगवती बाबू की लाइन जोड़ता हूँ, “न हम पाप करते हैं न पुण्य करते हैं | हम वही करते हैं जो हमें करना पड़ता है |” ‘रहस्य’ को हर लेखक, कवि, विचारक जानना चाहता है, राहुल भी उनमें एक हैं लेकिन जन्म से पहले और मृत्यु के बाद सिर्फ अनबूझा रहस्य ही है और वह अभेद्य है | ‘पथिक भ्रमित न होना’ कविता कवि की अपनी कठोर यात्रा से दूसरों को भी कठोरताओं से न घबराने का सन्देश है क्योंकि कहीं न कहीं तो ठौर मिलेगा ही, आशियाना छोटा सा बनेगा ही | कविता में आशावाद है | विलियम वर्ड्सवर्थ कहता है- “चाइल्ड इज द फ़ादर ऑफ़ मैन” किसी बच्चे को एकलव्य न होना पड़े राहुल इस कविता ‘बच्चे और दुनिया’ में प्रस्तुत करते हैं | ‘सिर्फ कविता के लिए’ शीर्षक कविता सिद्ध करती है कि कवि के लिए तो अब उसकी कविता, उसका जीवन बन चुकी है | ‘सौन्दर्य’ कविता को कीट्स की लाइनों से जोड़ता हूँ, “ए थिंग ऑफ़ ब्यूटी, जॉय फॉरएवर” तो ‘बकरी बनाम शेर’ विडंबनात्मक व्यंग्य है इस युग का | ‘आधा सच’ शीर्षक कविता आज के चलते हुए मुहावरों के प्रयोग के लिए एक अच्छा उदाहरण है | गली-कूंचों और सड़कों पर बहते-फैले वाक्यांशों को अपनी रचना में सुगठित ढंग से प्रयोग कर ले जाना मैं कवि की कलम की सफलता मानता हूँ | ‘भ्रष्टाचारम उवाच’ में एक ईमानदार आत्मा, बेईमानी, जालसाजी जैसे हवाले और घोटाले स्पष्ट रूप से दिखाई दिए हैं, “मैं बदनीयती की रोटी संग मिलने वाला/ फ्री का अचार हूँ/ पॉवर और पैसा मेरे हथियार हैं/ मैं अमीरों की लाठी/ और गरीबों पर पड़ने वाली मार हूँ !” उपरोक्त पंक्तियों में भ्रष्टाचार पर बिलकुल नूतन उपमान हैं |
‘अक्स में ‘मैं’ और मेरा शहर’ इस किताब की एक महत्त्वपूर्ण कविता है | कवि के तेवर इस कविता में देखते ही बनते हैं | राहुल लय, सुर, ताल के बंधनों से आज़ाद हैं लेकिन जिंदगी को देखने के लिए उनके पास बाह्य चक्षुओं के साथ अन्तः चक्षुओं की शक्ति काफी प्रबल है | इस कविता को पढ़ते हुए नीरज याद हो आए, “कदम-कदम पर मंदिर मस्जिद/ डगर-डगर पर गुरूद्वारे/ भगवानों की बस्ती में हैं ज़ुल्म बहुत इंसानों पर |” राहुल का कवि मानववादी है | कवि की अन्तः और बाह्य यात्राओं का सघन गुम्फन देखने को मिलता है इस रचना में | ‘कविता और कविता’ में ठूंठ से कोंपलों का फूट पड़ना नया उपमान है इसी तरह जंगल में झाड़ियों का उग आना भी नूतन उपमान है | ‘हारा हुआ आदमी’ कविता अपने सशक्त कथ्य के कारण अपने अर्थ में बहुत दूर तक ध्वनित होने वाली कविता है | इस कविता ने मुझे वैचारिक स्तर पर बड़ा आंदोलित किया | इस संकलन की आख़िरी कुछ कविताओं में वह कविता में प्रतिरोध भी रचते हैं | राहुल की कविताओं को पढ़ने के साथ साथ मैंने उन्हें कई गोष्ठियों में सुना भी है | उनकी शैली बड़ी मौलिक और प्रभावी है | राहुल सच को स्पष्ट शब्दों में बगैर किसी दुराव-छुपाव के सच कहने की हिम्मत रखते हैं | उनकी साफगोई मुझे अच्छी लगती है | वह अपनी कविताओं में कई बार ऐसे विषय भी उठा लेते हैं जिनके बारे में आज कोई समकालीन कवि लिख ही नहीं रहा | ‘अनिश्चित जीवन : एक दशा दर्शन’ में जीवन और मृत्यु जैसे जटिल विषय को कविता में समझने और खोलने का ऐसा ही एक प्रयास है | अंग्रेजी का निबंधकार स्टील कहता है औसत तीस वर्ष की उम्र के पहले मृत्यु के बारे में कोई सोचना नही चाहता | संस्कृत साहित्य के गर्भित सूक्ति वाक्यों के साथ इस संसार के दो छोर नापने की कोशिश करने वाले इस युवा कवि को समकालीन कविता में कमतर करके नहीं आंकना चाहिए |
विज्ञान की भाषा में मन कहाँ है लेकिन फिर भी अमूर्त मन है सबके पास | ‘मेरे मन’ शीर्षक कविता में कवि का वही मन एक साथी की तलाश में है | ‘प्रेम पथ का पथिक’ कविता को मैं अपनी कविता की कुछ पंक्तियों से जोड़ता हूँ, “जब-जब पूनम के चंदा ने/ हृदय उदधि में ज्वार उठाया/ ऊँची उठी तरंगें/ तुम तक तो मैं पहुँच न पाया !” संग्रह में ‘अंतिम इच्छा’ शीर्षक कविता कवि के अपने समय से आगे बढ़कर लिखी गयी कविता है | इस कविता को पढ़कर अंग्रेजी कवि राबर्ट ब्राउनिंग की कविता ‘लास्ट राइड टुगेदर’ कविता याद आती है | यह उदात्त भावनाओं की एक मार्मिक रचना है | एक शराबी की खराबी संवेदनापूर्वक चित्रित की गयी है ‘नशा’ शीर्षक कविता में, बिम्बधर्मिता कमाल की है | ‘अपराधी’ कविता में किसी व्यक्ति के आतंकवादी बनने का मनोविज्ञान है और गाँधी की पंक्ति ‘पाप से घृणा करो पापी से नहीं’, से रास्ता भी सुझाता है कवि | ‘सज्जनों के लिए’ कविता युगबोध को दर्शाती है और कहती है कि सज्जन लोग यदि प्रैक्टिकल न हुए तो आज की दुनिया उन्हें निगल जायेगी | ‘कौन तुम’ कविता में स्थूल और सूक्ष्म, आत्म एवं परमात्म सत्ता का स्वरुप देखा जा सकता है | ‘मेरे सृजक तू बता’ शीर्षक अपनी कविता में कवि कहता है, मन से सुनने वालों की कमी है | सुनने वाले तो मिल भी जाएँ लेकिन भावन करने वाले लोग बहुत कम हो गये | कविता छोटी है लेकिन मारक है | फ़िराक साहब की दो लाइनें अनायास याद आती हैं, “न समझने की बातें हैं- न समझाने की बातें हैं/ जिंदगी नींद है उचटी हुई दीवाने की |”
‘ये दुनिया : ये जिंदगानी’ नए उपमानों की दृष्टि से अच्छी कविता कही जायेगी | वर्ण्य विषय के साथ जैसे सायकिल के ट्यूब का पन्क्चर, गैस के सिलिंडर का ख़त्म होना, कमरतोड़ महंगाई और जनसँख्या बराबर पीठ पर लदा नटखट बच्चा | इन नवीन उपमानों को उदृत करने का कारण यह है क्योंकि यह लिखने वाले के नूतन उपमान हैं | नूतन उपमानों को लाने का कार्य अज्ञेय ने किया अतः कवि प्रगतिशील होने के साथ साथ प्रयोगधर्मी भी है | ‘एक टुकड़ा आकाश’ कविता में खण्डों में बंटा हुआ जीवन लगभग हर पहलू को स्पर्श करता है | जितना कुछ कवि की दृष्टि में आ गया है वह इस कविता के टुकड़े में समाया है | ‘राजस्थान की एक लड़की’ में कवि राहुल की सूक्ष्मता से देखने वाली आँखें और संवेदनशील विशाल हृदयता के दर्शन होते हैं | डाल से बिछुड़ी हुई टहनी, झुण्ड से बिछुड़ा हिरन जैसी बातें भी याद आ जाती हैं इसको पढ़कर | अंत में उसे लोगों की संकुचित मानसिकता पर कटाक्ष करते हुए उसे भारत की बेटी कहकर कवि कविता में अपने निर्वाह तत्व का लक्ष्य एक सीमा तक पूरा कर लेता है | ‘शहर की सड़कें’ शहरों में दिन-प्रतिदिन होने वाले हादसों के प्रति सड़कों पर गुज़रते राहगीरों की असंवेदनशीलता का चित्र है लेकिन इसके लिए भारत की बढ़ती जनसँख्या, कानूनी पेचीदगी भी तो ज़िम्मेदार है | कविता पाठक को अपने अंत के साथ विचलित कर देती है जब पता लगता है कि सड़क की हर एक घटना अगले दिन के अखबार की ख़बर से ज्यादा कुछ नहीं |
‘महाप्रलय’ शीर्षक संग्रह की एक महत्त्वपूर्ण कविता पढ़कर मुझे एस.टी. कोलरिज की ‘राइम ऑफ़ द एशियेंट मारिनर्स’ याद आ गई | मैं जानता हूँ कि राहुल विज्ञान के विद्यार्थी रहे हैं अतः अंग्रेजी की यह कविता उन्होंने नहीं पढ़ी होगी फिर भी उस कविता जैसा कुछ तत्व मुझे इसमें दिखा | मैं यह इसलिए भी लिख रहा हूँ क्योंकि दुनिया भर के कवि दिलों में ऐसी बातें आती हैं | हाँ मानता हूँ कामायनी का जल-प्लावन कवि की चिन्तना में जरूर समाया होगा | समकालीन कविता समय में ऐसी श्रेष्ठ कवितायें भी रची जा रही हैं देखकर हिंदी कविता के सुखद भविष्य की आश्वस्ति होती है | कविताओं में कहीं कहीं आई सपाटबयानी राहुल की अपनी निजी है | ‘अनहद नाद’ जैसी कविता में कवि की जनपक्षधरता का सहज आभास मिलता है | इस कविता के माध्यम से कवि प्रस्तुत करता है चित्र उस व्यक्ति का जो समाज के सबसे निचले पायदान पर पहुँच कर भिखारी हो गया है, यह सामाजिक सरोकार की कविता है|
‘गाँव से शहर तक’ में कवि प्रेमचंद के गाँव खोज रहा है | ग्रामीण मानसिकता में भी शहरों का बढ़ता हुआ जंगल का मीठा जहर घुस गया है जोकि आज का कड़वा सच है | अपने कालखंड के भौगोलिक परिवर्तन पर भी कवि की नज़र है | कवि जैसा होता है, कवि राहुल स्वयं कवि है इसलिए ठीक नपे-तुले वाक्यांशों में इसे सिद्ध करते चले गये हैं और ‘कवि ऐसा होता है’ एक सार्थक कविता बन जाती है | कहा जाता है प्रेमी, पागल और कवि एक जैसे होते हैं, अगर वे नकली नहीं होते तो पथान्वेषी होते हैं | टेनिसन कहता है, “चेंज इज द लॉ ऑफ़ यूनिवर्स” कवि राहुल फूलों को यह शाश्वत परिवर्तन बताना चाहते हैं अपनी ‘परिवर्तन’ शीर्षक कविता में | दलदल बहुत प्रकार का होता है और राहुल की ‘दलदल’ शीर्षक कविता जीवन के बहुआयामी दलदल का चित्र प्रस्तुत करती है | यह कविता अपने अर्थों में एक बड़े कैनवास की ओर संकेत करती है | उनकी कुछेक कविताओं में शब्दस्फीति थोड़ी ज्यादा है, शिल्प भी कहीं कहीं टूटता है और कहीं-कहीं पर संस्कृत तथा अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग भी मिलता है | चूँकि यह संग्रह कवि की काव्ययात्रा के प्रारंभ की घोषणा करता हुआ आया है अतः काव्यशास्त्रीय या आलोचकीय दृष्टि से इस पक्षपर बहुत ज्यादा विवेचन किया जाना उचित नहीं प्रतीत होता | संग्रह की अंतिम कविता ‘एक आस्तिक की स्वीकारोक्ति’ में कवि अंग्रेजी के दो हस्ताक्षरों के समीप पहुँच जाता है, वे हैं टैनीसन और टॉमस हार्डी क्योंकि ये दोनों प्रकृति को वर्ड्सवर्थ की तरह नहीं देखते हैं | “सारा तंत्र ही भ्रष्ट है/ समय का फेर है/ यह उबाल कैसे न आता/ जब नदी का पानी/ खतरे की रेखा से ऊपर बह रहा हो !” कविता की उपरोक्त पंक्तियाँ हर विवेकशील को सोचने पर विवश कर देती हैं | प्रकृति का शत्रुवत व्यवहार, सृष्टि के प्रति, विधि-विधान और नियतिवाद से गुज़रता हुआ कवि ऐन्द्रिक संसार अंगों के कार्य व्यापार को खोलता जाता है | कवि आस्तिकता की परम्परागत बेड़ियों को अपने तर्कों से तोड़कर आस्था का अपना एक नया मानदंड निर्मित करना चाहता है | कविता में स्त्री-पुरुष के संबंधों पर अपनी सोच के अनुसार कवि का मौलिक विश्लेषण भी सामने आता है |
समग्रतः कहा जाए तो राहुल अपनी सीधी, सरल भाषा में दोनों, भावों और विचार के स्तर पर बहुत गहरे तक प्रभावित करते हैं | 112 पृष्ठ के इस संग्रह का मूल्य बहुत ही कम मात्र 20 रुपये है | इलाहाबाद के अंजुमन प्रकाशन ने काफी कम समय में साहित्य सुलभ संस्करण जैसी साहित्यिक पुस्तकों का प्रकाशन कर के प्रकाशन जगत में अपनी एक सशक्त उपस्थिति दर्ज कराई है | हिंदी साहित्य के पाठकों के लिए शुरू की गयी यह एक अच्छी शुरुआत है | अच्छे साहित्य को चाहने वालों को इस युवा कवि की कविताओं का आस्वादन और स्वागत अवश्य करना चाहिए |

-    विनोद कुमार
उपाध्यक्ष ‘निराला साहित्य परिषद्’

महमूदाबाद (अवध) सीतापुर (उ.प्र.) 261203

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