'कोहरा सूरज धूप' की समीक्षाएँ
"माँ! शब्द दो! अर्थ दो!” ये तीन पंक्तियाँ मिलकर एक छोटी सी कविता रच देती हैं। ये कविता उस यात्रा की शुरुआत है जिसका प्रारंभ घने कुहरे से होता है। हमारा अस्तित्व भी माँ से ही शुरू होता है। हमारे जीवन को पहला शब्द और पहला अर्थ माँ ही देती है। इसके बाद होती है जीवन-यात्रा जो अज्ञान के कुहरे से शुरू होती है।
बच्चे हर चीज को उसके स्वाद से पहचानने की कोशिश करते हैं। तब माँ सिखाती है कि हर चीज का स्वाद जुबान से नहीं लिया जा सकता। दुनिया को जानने समझने के लिए आपको हर इंद्रिय का प्रयोग करना पड़ता है और किस वस्तु को किस इंद्रिय से महसूस किया जा सकता है यह माँ ही सिखाती है। माँ ज्ञान का सूरज भी है और आनंद की धूप भी। इस तरह ‘कोहरा सूरज धूप’ नामक कविता संग्रह की यात्रा शुरू होती है जो बृजेश ‘नीरज’ जी के कल्पनालोक में ले जाती है।
अद्भुत बिम्बो से भरी सुबह हो रही है। यात्रा के प्रारंभ में ही कुछ द्वीप हैं जिनसे सटकर भगीरथी की धारा ठिठकी हुई है जिसकी स्याह लहरों में घुटकर रोशनी दम तोड़ देती है। निगाह नीले आसमान की तरफ जाती है और मन में सदियों पुराना प्रश्न सिर उठाता है। क्या होगा अंत के बाद? सामने मोमबत्तियों को घेरे हुए भीड़ दिखाई पड़ती है पर वो भी रोशनी को दम तोड़ने से नहीं बचा पाती।
आगे बढ़ने पर कुहरा छँट जाता है और सूरज चमकने लगता है। सूखे खेत, कराहती नदी और बढ़ते बंजर दिखाई पड़ते हैं। सड़क का तारकोल पिघलने लगता है। यात्रा करते समय काग़ज़ पर सीधी लकीर खींचने की सारी कोशिशें बेकार साबित होती हैं। ‘कोहरा सूरज धूप’ की यात्रा जीवन की यात्रा भी है। जहाँ लगातार कोशिशें करने के बावजूद भी सीदा सादा बनकर नहीं जिया जा सकता। इंसान करे तो क्या करे।
आगे दिखाई पड़ती हैं जमीन के शरीर पर खिंची ढेरों लकीरें जिन्हें लोग पगडंडियाँ कहते हैं। पगड़ंडियाँ तब बनती हैं जब इंसान एक ही रास्ते से बार बार गुज़रता है। पर क्यों गुज़रता है इंसान एक ही रास्ते से बार बार? क्योंकि उस रास्ते के अंत में प्रेम उसकी राह देख रहा होता है। प्रेम, जिसके बिना इंसान का जीवित रहना निरर्थक है। इसलिए नये रास्तों पर चलने की चाहत को भीतर दबाये वो बार बार उन्हीं रास्तों से होकर गुज़रता है। कभी भटक गया तो भी लौट कर वापस उन्हीं पगडंडियों पर आता है।
अचानक लगता है कि इस रास्ते में आकाश, हवा, पानी, धूप, धूल, सितारा, सूरज, चाँद, ग्रह आकाशगंगा सबकुछ कवि की कल्पना का विस्तार मात्र है। कवि भी उन्हीं मूलभूत कणों और गुणों से बना है जिनसे सारा ब्रह्मांड बना है। अंतर मात्र इन कणों की संख्या का है। अचानक एक प्यार भरा स्पर्श कवि को कल्पनालोक से निकाल कर ला पटकता है जीवन के कठोर धरातल पर और कहता है कि उठो अभी कल की रोटी का जुगाड़ करना है तुम्हें। कवि को ध्यान आता है कि इन पगडंडियों में से कुछ उदास, खामोश पगडंडियाँ उन घरों तक जाती हैं जो स्मृतियों के बोझ तले ढहने लगे हैं। इन पर अब कोई नहीं चलता इसलिए खेत धीरे धीरे इनपर अपना कब्ज़ा जमाते जा रहे हैं और ये हरे रंग की एक दुबली पतली लकीर के जैसी दिखने लगी हैं।
आगे बढ़ने पर गर्मी अचानक बढ़ जाती है और इस प्रचंड गर्मी में सिर पर ईंटे ढोता एक आदमी दिखाई पड़ता है जिसकी आँतों में भूख का तापमान वातावरण के तापमान से अधिक है। गर्मी हमेशा उच्च तापमान से निम्न तापमान की तरफ बहती है इसीलिए गरीब आदमी प्रचंड गर्मी में भी जिन्दा रह पाता है। कवि अपने कंधों पर लदे तीन शब्द आदमी, भूख, पेट के बदले में तीन नए शब्द माँगता है मगर पूरा संसार मिलकर भी उसे तीन नए शब्द नहीं दे पाता। ये शब्द कवि के कंधों पर लदे हुए दिखते जरूर हैं मगर सच तो यह है कि धूप की गर्मी ने ये शब्द कवि की आत्मा के साथ वेल्ड कर दिये हैं। यहाँ से यात्री को यकीन हो जाता है कि वो सचमुच किसी कवि के कल्पनालोक की यात्रा कर रहा है किसी मायानगरी की नहीं।
आगे चलने पर मिलती है जमीन की तलाश में भटकती एक टूटी शाख जो लाल बत्ती पर खड़ी होकर अपनी फटी कमीज से गाड़ी पोंछ रही है। कवि कहता है कि तुम्हारी जमीन दिल्ली में एक गोल गुम्बद के नीचे कैद है। पहुँच सकोगी वहाँ तक? यह सुनते ही सूरज बड़ी तेजी से चमकने लगता है, बारिश होने लगती है, बादल फटता है। सबकुछ पिघलते अँधेरे में गुम हो जाता है। कवि लालटेन लिखना चाहता है पर अँधेरे में कैसे लिखे?
आगे बढ़ने पर मिलते हैं प्रेम और जीवन जिनके सामने जाने के लिए कवि ढूँढने लगता है अपना चेहरा। वो तारे तोड़ लाना चाहता है पर चुपचाप खाली बाल्टी को बूँद बूँद भरते हुए देखने के अलावा कुछ नहीं कर पाता। अचानक यादों की किताब खुल जाती है और कवि को याद आता है कि प्रेम की बारिश के बगैर बहुत से सपने सूख गये हैं। आकाश और धरती के बीच कवि का अहंकार अकेला खड़ा है। कवि उसे दूर से नमस्कार कर आगे चल पड़ता है।
आगे मिलता है कंक्रीट का जंगल जहाँ दो पल सुकून से बैठने के लिए कवि जगह की तलाश में भटकता है। कवि को ढेर सारे मकान मिलते हैं अपने अपने नंबरों को सीने से चिपकाए और बशीर बद्र का ये शे’र याद आता है।
घरों पे नाम थे नामों के साथ ओहदे थे
बहुत तलाश किया कोई आदमी न मिला
अचानक कवि को दिख जाता है उसका प्रेम और कवि कह उठता है कि तुम्हारा आना एक इत्तेफ़ाक हो सकता है लेकिन तुम्हारा होना अब मेरी आवश्यकता है। कवि को दिखाई देती हैं बंद खिड़कियाँ जिनपर हवा बार बार दस्तक दे रही है। कवि के कल्पनालोक में भी रात होती है और हवा डर से काँपने लगती है लेकिन जल्द ही रोशनी की पहली किरण भी दिखाई देने लगती है। यहाँ कवि को अहसास होता है कि समय उससे बहुत आगे निकल चुका है। समय कल्पना की गति से भी तेज गति से भाग रहा है।
आगे बढ़ने पर कुहरा एक बार फिर घना हो जाता है पर कवि को यकीन है कि ये एक बार छँटा है तो दुबारा भी छँटेगा और वो भावों की लालटेन लिये आगे बढ़ता रहता है। कुहरे में रास्ता तलाशना मुश्किल साबित हो रहा है कवि बार बार आगे बढ़ता है मगर रास्ता बंद पाकर वापस लौट आता है। कवि के मन में कुहरे की जेल से आज़ाद होने की इच्छा बलवती होने लगती है और वो जन-गण-मन गाने लगता है। अचानक कुहरा छँट जाता है और दिखाई पड़ने लगती है बरसात के अभाव में बंजर होती जमीन।
तभी पास में ही कहीं आँधी चलने लगती है और कवि की आँखों में धूल के कण चुभने लगते हैं। कवि आँखें मलने लगता है और उसे दिखाई पड़ते हैं प्रतिपल रंग बदलते हुए अक्षर। उसकी आँखों से स्याही की बूँद निकलकर क्षितिज की ओर चल पड़ती है। पता नहीं रंग बदलते हुए अक्षरों से निर्मित होने के कारण शब्द खामोश हैं या फिर उन्होंने दो मिनट का मौन धारण कर लिया है क्योंकि शाहजहाँ ने उनके पिता का सर (कवि के हाथ) कटवा दिया है।
आगे चलने पर दिखाई पड़ता है कवि का गाँव जिसे देखते ही कवि रेज़ा रेज़ा होकर अपने गाँव की मिट्टी में बिखर जाता है। मिट्टी उसे फिर से नया और तरोताजा कर देती है। कवि सूखी भूरी घास की चुभन महसूस करता हुआ फिर से उठ खड़ा होता है और उसे याद आता है कि कविता बैसाखियों पर नहीं चलती। यहीं कवि लिखता है मित्र के नाम एक कविता और निश्चय करता है कि ढूँढनी ही होगी कौंधते अंधकार में प्रकाश की किरण जो उसे मिल जाती है किसी के मुस्कुराते चेहरे में।
सामने से अचानक एक हाथी डर से भागता हुआ निकल जाता है। उसे बचाने हैं अपने दाँत। लेकिन वो उस सड़क पर भागता है जो संसद को जाती है और सब जानते हैं कि आगे जाकर यह सड़क बंद हो जाती है।
आगे कवि को मिलता है सजा धजा चमचमाता हुआ बाजार जिसमें कवि अंधेरे के कण ढूढने का प्रयास करता है। कवि देखता है बाजार में फूल बास मारते हुए झड़ रहे हैं क्योंकि इनमें संवेदना की खुशबू नहीं है। कवि शहर के बड़े चौराहे की बड़ी दीवार के पास पहुँचता है और उस पर लोकतंत्र लिखने की कोशिश करता है। जैसे ही वह ‘ल’ लिखता है दीवार फ़ौरन सफ़ेद रंग से पोत दी जाती है और कवि को गायब कर दिया जाता है।
कवि को गायब कर देने से कवि मिटता नहीं बल्कि और विराट होकर लौटता है। सोये हुए कुम्हार को जगाता है और उससे कहता है कि उठो! गढ़ो! यह सोने का समय नहीं है। कुम्हार को जगाकर कवि निकल पड़ता है सत्य की खोज में।
इतनी दूर तक आते आते कवि का थक जाना स्वाभिवक है। कवि की थकान देखकर उसका मित्र कहता है कि नीरज, बड़े दिनों बाद आये। आओ साथ साथ बैठकर लइया, गुड़, चना और हरी मिर्च की चटनी खाएँ। मित्र का स्नेह कवि को एक बार फिर तरोताज़ा कर देता है और तब ये परम सत्य कवि की समझ में आता है। तन माटी से ऊपजा, तन माटी मिल जाय।
आगे दिखाई पड़ता है एक घर जिसके आँगन में बैठा बच्चा रो रहा है क्योंकि उसके हिस्से की रोटी कोई चुराकर खा गया है। पीपल केवल अफ़सोस व्यक्त करके चुप हो गया है। इसी गली के कोने पर बने मकान में एक बुढ़िया की देहरी का दिया आज भी टिमटिमा रहा है किसी अनजानी आशा में। कवि भटकता है सतर में अर्थ की तलाश करता हुआ किंतु अचानक निहारता रह जाता है मुँह बिराते अक्षरों को।
अंत में कवि पहुँचता है अपने आराध्य की शरण में। उनको बताता है कि धन-शक्ति के मद में चूर रावण के सिर बढ़ते ही जा रहे हैं। मर्यादापुरुषोत्तम तो जग में बहुत हैं मगर शबरी के बेर खाने वाले, केवट को गले लगाने वाले, बंदरों की सहायता करने वाले, शरणागत राक्षस का भी उद्धार करने वाले राम कहीं गुम हो गये हैं। कवि पुकार उठता है, "राम! तुम कहाँ हो?”
माँ से शुरू हुई यात्रा राम तक पहुँचती है। दीन, दुखियों, निर्बलों के राम तक। पर ये यात्रा का केवल एक अस्थायी पड़ाव है। इतनी दूर तक आने वाले थका नहीं करते। वो पड़ावों पर जीवन नहीं बिताते। वो तो चलते रहते हैं, चलते रहते हैं जब तक साँस चलती है। यात्रा आगे भी जारी रहेगी इस उम्मीद के साथ कोहरे से धूप तक का सफर यहीं समाप्त हो जाता है।
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‘कोहरा सूरज धूप’ एक समर्थ कवि के
आने की आहट - डॉ गोपाल नारायन
श्रीवास्तव
जीवन काल में बहुत कुछ
प्रथम बार घटता है। कुछ घटनाये पूर्व नियोजित होती हैं और कुछ अप्रत्याशित।
अप्रत्याशित पर तो किसी का कोई वश नही है परन्तु जो पूर्व नियोजित होती है उनमे
पुरूषार्थ निहित होता है। किसी उदीयमान रचनाकार के लिए उसकी प्रथम कृति का प्रकाशन
एक ऐसी ही घटना है। यह कृति ही रचनाकार के भविष्य-पथ का संधान करती है। मैथिलीशरण
गुप्त को उनकी प्रथम काव्य कृति ‘जयद्रथ वध’ से ही भरपूर पहचान मिली थी। कहते है पूत के पाँव पालने मे ही दिखते है
अर्थात ‘होनहार बिरवान के होत चीकने पात’। प्रथम कृति से ही कवि काव्य-निकष पर परखा जाता है । ‘कोहरा सरज धूप’ ऐसे ही एक उदीयमान
कवि बृजेश नीरज की प्रथम अतुकान्त काव्य रचना है जिसमे शीर्षक के अभिप्रेत से जीवन
के लगभग सभी तापमान अभिव्यंजित है या फिर कहे थोड़ी शीतलता है, थोड़ी आग है और कुछ गुनगनाहट भी है। इस काव्य मे वह सब खूबियाँ हैं जो
रचना पर एक विहंगम दृष्टि डालते ही प्रमाता को सहसा जाग्रत कर देती हैं। दो-एक
कविताएँ पढ़ते ही यह निश्चय दृढ़ होने लगता है कि हम किसी नौसिखिए की नही अपितु एक
गंभीर चिंतक कवि की रचना पढ़ रहे हैं। यदि प्रथम प्रयास की यह गरिमा है तो निश्चय
ही कहा जा सकता है कि कवि का भविष्य उज्जवल है ओर वह काव्याकाश मे नये क्षितिजो का
संधान अवश्य करेगा। इस कथन की पुष्टि मे ‘धारा ठिठकी’ शीर्षक कविता का अध्वांकित अंश ही पर्याप्त है जिसमे कवि ने प्रदूषित
गंगा के दर्द को शिद्दत से बयान किया है। यहाँ एक रूपक भी प्रच्छन्न रूप से विद्यमान
है। जीवन भी तो एक नदी की तरह है।
‘प्रवाह सरस, सरल नही
बस भौंचक है
अपने प्रारब्ध पर
पाँव थके हैं
लेकिन
छाती पर उगे
ईट के जंगलो से
वेदना दिखती नही
बस
कभी-कभी
रात के सन्नाटे में
एक कराह प्रतिध्विनित होती है
‘हे भगीरथ
तुम मुझे कहाँ ले आए?’
उक्त पंक्तियाँ तो
निदर्शन मात्र है। सम्पूर्ण काव्य में ऐसी ही मार्मिक वेदना का चित्रोपम वर्णन हुआ
है। ‘उस पार’ कविता मे परलोक को
इस लोक के जीवन सदृश्य अथवा इससे भिन्न जो भी स्थिति हो, उस सत्य को जानने
की जिज्ञासा है किन्तु उस पार अपनी ईच्छा से जा पाना संभव नहीं। कोई ऐसा गुरु-रूपी
पंछी अगर मिल जाए तो वह राह-रूपी पंख प्रदान करे। एक अदद गुरु गरुड़ की तलाश है।
‘जाए बिन
जाना कैसे जाए
और जाने को चाहिए
पंख
पर पंख मेरे पास तो नही
चलो पंछी से पूँछ आएँ -
गरुड़ से
ढूँढते हैं गरुड़ को”
प्रकृति और जगत में जो
कुछ भी घटित हो रहा है, उस पर किसी का
अंकुश नहीं है। इस सत्य के आधार पर कवि एक वातावरण की सृष्टि करता है। कवि का अपना
कुछ भी कथ्य नहीं है, है तो बस केवल एक
परिवेश। इस परिवेश से ही जीवन्त होता है एक मार्मिक व्यंग्य। कवि की इस अनिवर्चनीय
कला का कायल कोई भी संवेदनशील पाठक हो सकता है। ‘आज़ाद हैं’ शीर्षक कविता की एक बानगी इस प्रकार है-
‘लोकतंत्र के गुम्बद के सामने
खम्भे पर मुँह लटकाए बल्ब
अकेला बरगद
ख़ामोशी से निहारता
अर्ज़ियाँ थामे लोगों की कतार
बढ़ता कोलाहल
पक्षी के झरते पर
गर्मी मे पिघलता
सड़क का तारकोल
सब आजाद है!”
मानव जीवन क्या उसके वश में
है या वह परिस्थितियों का दास है अथवा फिर कोई नियन्ता उसकी डोर थामे है। गोस्वामी
तुलसीदास की माने तो- ‘उमा दारु जोषित की
नाई। सबहि नचावत राम गोसाई।’ इसके बाद भी
जीवन-सागर मे हाथ पैर तो मारना ही पड़ता है। मानव प्रयास की कोई नियति नहीं है।
दाँव कभी सीधा तो कभी उल्टा। भगवान कृष्ण कहते हैं हाथ-पाँव मारो परन्तु ‘मा फलेषु कदाचन’। सारांश यह कि
जीवन पर मनुष्य का कोई वश नहीं। इस भावना को ‘लकीर’ नामक कविता में कवि बृजेश नीरज ने बखूबी उभारा है-
‘बार-बार कोशिश है
सीधी लकीर खींचने की
लेकिन
कभी हिल जाता है
हाथ
कभी कागज मुड़ जाता है
तो कभी
टूट जाती है
पेंसिल की नोक
करूँ क्या?
पटरी रखकर
तो नही खीची जा सकती
जिन्दगी की लकीर”
राष्ट्र कवि मैथिलीशरण
गुप्त ने ‘साकेत’ मे एक स्थान पर
लिखा है- ‘दोनों ओर प्रेम पलता है। सखि पतंग ही नही, दीपक भी जलता है।’ कवि बृजेश नीरज की
त्रासदी यह है कि वे इस चिरन्तन सत्य को समझ नहीं पाए और अपने प्रेम को उन्होंने
इक तरफा समझा और बाद में जब समय ने उन्हें सही जानकारी दी तो समय निकल चुका था।
जीवन की यह हताशा उनकी कविता ‘तुम्हारी आँखों में’ भली प्रकार प्रकट हुई है। उदाहरण इस प्रकार है-
‘तुम हमेशा ही
एक उम्मीद थी
मै ही आँख मूँदे मूंदे रहा
अपने सपनो से
जो हमेशा तैरते रहे
तुम्हारी आँखों मे।’
एक चिरन्तन प्रश्न है कि
ईश्वर ने यह सृष्टि क्यों बनायी? आर्ष ग्रंथ कहते
हैं यह उनकी लीला है। जब सोते है प्रलय हो जाती हैय जागते है तो लीला रचते हैं।
मनुष्य हतप्रभ होकर सोचता है, मैं क्या हूँ? मैं क्यों हूँ? ईश्वर ने मुझे
क्यों बनाया? क्या केवल उदर पूर्ति कर मर जाने के लिये
या मानव जीवन का कोई उद्देश्य भी है। संत मत कहता है मनुष्य का दुर्लभ जीवन ईश्वर
की भक्ति या साधना कर मोक्ष पाने हेतु मिलता है। परन्तु ग्रंथ यह भी कहते हैं कि
भक्त मुक्ति का आकांक्षी नहीं होता। वह तो जन्म-जन्मान्तर तक केवल भक्ति ही चाहता
है। परन्तु जो भक्ति के स्तर तक नहीं पहुँचे हैं उन क्षुद्र मानवो के जीवन की गति
क्या है? जाहिर है इस प्रश्न के उत्तर की तलाश अभी
जारी है। मनुष्य विज्ञान के बल पर चाँद और मंगल ग्रह तक पहुँच गया परन्तु क्या वह
अपने जीवन का उद्देष्य पा सका। ‘मैं क्या हूँ?’ कविता में यही प्रश्न कवि अपने आप से करता है। परन्तु समस्या वही है कि
क्या यह रहस्य कभी खुलेगा? कवि के शब्दों में
-
‘शायद हो जाऊँ हवा
और हवा के संग
यह धरती, आसमान
चाँद, तारे, सूरज
ग्रह, आकाश गंगा
सबको पार करते
पहुँच जाऊँ
सुदूर ब्रह्माण्ड मे
या उसके भी आगे
तब भी समझ आयेगा क्या
यह सारा रहस्य”
रामधारी सिंह ‘दिनकर’ के महाकाव्य ‘उर्वशी’ का नायक पुरूरवा एक स्थल पर कहता है-
‘पर, न जानें, बात क्या है!
इन्द्र का आयुध पुरुष जो झेल सकता है,
सिंह से बाँहें मिलाकर खेल सकता है,
फूल के आगे वही असहाय हो जाता,
शक्ति के रहते हुए निरुपाय हो जाता
विद्ध हो जाता सहज बंकिम नयन के बाण से
जीत लेती रूपसी नारी उसे मुस्कान से”
सच ही तो है नारी के
साहचर्य मे व्यक्ति क्षण भर के लिये अपनी व्यथा भूल सा जाता है। पर पुरूरवा की बात
और थी वह इस धरती का शासक था। बड़े-बडे देवता उसके बल से थर्राते थे। मगर सामान्य
मानव की व्यथा-कथा नारी साहचर्य के क्षणिक तोष से कहीं बड़ी है। बृजेश नीरज ने ‘तुम्हारा स्पर्श’ नामक कविता में इस दर्द को बडी संवेदना के
साथ रुपायित किया है -
‘लेकिन
रात की इस शीतलता में भी
चुभती है एक बात कि -
शेष है
कल की रोटी का जुगाड़”
जीवन की विभीषिका से तंग, थके-हारे व्यक्ति प्रायः अपना घर छोड़कर रोज़गार की तलाश में शहर आते हैं
और नियतिवश यहीं बस जाते हैं। गाँवों में उनके घरों पर ताले लगे होते हैं।
धीरे-धीरे वे घर देख-रेख के अभाव में नष्ट होने लगते हैं। खर-पतवार उग आते हैं।
कबूतर अपना आशियाना बना लेते हैं। सब कुछ पुराना और जर्जर हो उठता है। पर कोई तो
है जो उस सूने घर में भी नित्य आता है और किसी अप्रत्याशित आहट की तलाश करता है।
कवि की संवेदना इस प्रसंग मे कविता ‘आहट’ में देखते ही बनती है। निदर्षन इस प्रकार है -
‘जगह-जगह उग आए हैं
खर-पतवार
न शहनाई, न मातम
न बरता है दिया
देहरी पर
रोज साँझ ढले
अस्त होते सूर्य की
किरणें
आ जाती हैं
टटोलने कोई आहट”
बिहारीलाल जयपुर नरेश राजा
जयसिंह के आश्रित दरबारी कवि थे। एक बार उनके दरबार में एक चित्रकार आया उसने राजा
को एक चित्र दिखाया। चित्र में सर्प, मोर, हिरन और सिंह सब एक ही स्थान पर चित्रवत खड़े थे। चित्र के नीचे लिखा था- ‘केहिलाने एकत बसत अहि, मयूर, मृग, बाघ।’ चित्रकार ने राजा
से कहा क्या आपके राज्य मे कोई ऐसा विद्वान कवि है जो इस अर्द्ध दोहे को पूरा कर
सके। निदान- बिहारी बुलाए गए। उन्होंने चित्र देखा। पल भर विचार किया और तत्काल
दोहे को इस प्रकार पूरा किया- ‘जगत तपोवन सा किया
दीरघ-दाघ-निदाघ।’ अर्थात गरमी की शिद्दत से पशु आदि जीव भी
इतने निश्चल और निष्क्रिय हो गए हैं कि वे अपने सहज स्वाभविक शत्रु अथवा आहार को
भी छूने में समर्थ नहीं रहे और उनके इस व्यवहार के कारण संसार तपस्थली बन गया, जहाँ लोग अपना स्वाभविक बैर भी भूल जाते हैं। बिहारी के इस कथन मे
उक्ति-वैचित्र्य अधिक है परन्तु कवि बृजेश ने ‘गर्मी’ शीर्षक अपनी कविता में जिस कटु यथार्थ का वर्णन किया है वह प्रमाता के
मानस को झकझोर कर रख देता है। बानगी पस्तुत है -
‘वह सड़क कुछ दूर जाती है
फिर भाप बन उड़ने लगती है
तारकोल पिघल कर
पैरो मे चिपकने लगी है
लेकिन तभी दिखता है
एक आदमी
सिर पर ईंटें ढोता
कहीं पिघला न दे उसे भी
यह गरमी
लेकिन शायद
उसके आँतों का तापमान
बाहर के तापमान से अधिक है।’
भूख और बेकारी देश की
ज्वलन्त समस्या है इसीलिए अधिकांशतः यहाँ बचपन पैसा कमाने के लिये विवश है। किसी
का परिवार अपने बच्चे का पेट भरने मे असमर्थ है तो कोई जन्म से अनाथ है। परन्तु
क्या इस बचपन को पेट भरने के लिये भरपूर श्रम करने के बाद भी मजदूरी के लिये
रिरियाते और बदले में पैसे के स्थान पर ठोकरें खाते देखने के बाद उस इन्तेहाई दर्द
को हमने कभी महसूस किया। असंगति यह भी है कि बावजूद तमाम ठोकरें खाने के बाद यह
बचपन अपने उसी कृत्य को दुहराने के लिये इस आशा में बाध्य है कि शायद उस बार नहीं
तो इस बार पेट भरने लायक पैसे मिल जाएँ। बाल मजदूर के इस दर्दीले वैवष्य का बड़ा ही
सुन्दर चित्रण कवि ने ‘बचपन’ नामक अपनी कविता में किया है। दृष्य इस प्रकार है-
‘पैसे के लिये हाथ फैलाते ही
बिखर गया बाल पिण्ड
सूखे होठों पर
किसी उम्मीद की फुसफुसाहट
लाल बत्ती हरी हो गयी
गाड़ी चल पड़ी
गन्तव्य को
बचपन पीछे छूट गया
एक कोने में खड़ा
कमीज को अपने
बदन पर डालता
आँखों में
भूख की छटपटाहट
व्यवस्था के पहियों तले
दमित बचपन
बेचैन था वयस्क हो जाने को”
मनुष्य के पुरुषार्थ की भी
एक सीमा है। शाहजहाँ ने ताजमहल बनवाया तो इतिहासकारों ने प्रमाण मान लिया कि वह
अपनी पत्नी मुमताज़ को इन्तेहायी मोहब्बत करता था। कोई प्रबुद्ध इस गल्प को कैसे
माने। इतिहास गवाह है कि समय पड़ने पर भारतीय नारियों और उनके पतियों ने एक-दूसरे
के लिए अपने प्राण दिये भी हैं और लिए भी। रानी सारन्धा और राजा चम्पतराय की कहानी
हम भूले नहीं हैं। अपनी सामर्थ्य और सीमा का तथ्यांकन कवि बृजेश नीरज ‘तारे’ नामक कविता में बड़े ही सहज भाव से करते
हैं। परन्तु उसमें छिपा है एक दंष जो प्रमाता को हिलाकर रख देता है। उदाहरण निम्न
प्रकार है -
‘चाहता हूँ मैं भी
तोड़ लाना आसमान के तारे
तुम्हारे लिये
लेकिन क्या करूँ
मेरा कद है बौना
हाथ छोटे”
भारत की स्वतंत्रता असंदिग्ध थी पर वह स्वतंत्र नहीं हुआ था। उम्मीद की
किरणें फैल चुकी थीं। मैथिलीशरण गुप्त ने इसे बड़े सांकेतिक शब्दों में व्यक्त
किया- ‘सूर्य का यद्यपि नहीं आना हुआ। किन्तु
समझो रात का जाना हुआ।’ कुछ ऐसी ही सुरभित
आशा कवि की कविता ‘उम्मीद’ में मिलती है। जैसे-
‘कसमसाते
करवटें बदलते
गुजर रही है रात
पल-पल
एहसास कराती अपनी गहनता का
खामोशी के साथ
हालांकि अब भी अँधेरे में हूँ
लेकिन कुछ रोशनी आ रही है मुझतक
सुबह होने को है”
कवि जिस दिन संतुष्ट हो
गया समझो उसका अन्त हो गया। एक सतत पिपासा जब तक उसका पीछा न करे और भावों के पीछे
जब तक वह बेतहाशा न भागे तब तक उसका प्रयास बेमानी है। सच्चा कवि वही है जो भाव
पकड़ने की चाह में सदा अभावग्रस्त रहता है। भाव उसे अति भाव को पाने की प्रेरणा
देते हैं। बृजेश नीरज ने ‘हर बार’ नामक अपनी कविता में इस सत्य का जीवन्त चित्रण किया है। बानगी इस प्रकार
है-
‘कुछ है जो
कहने से रह जाता है हर बार
कोई सत्य है
अब भी समझ से परे
इतने शोर में तो
आगे बढ़ना भी मुश्किल है”
देश की स्वाधीनता का जो
स्वरूप अब उद्घाटित हुआ है उसे देखकर हम यह सोचने को बाध्य हो गए हैं कि क्या
अंग्रेजों का शासन वर्तमान शासन से बेहतर था। बृजेश नीरज के अनुसार वह मात्र सत्ता
परिवर्तन था। स्वाधीनता तो जनता को फुसलाने का एक स्वगठित मंत्र मात्र था। संभव है
इस विश्लेषण से सब सहमत न हों परन्तु राजनीति को जो नैतिक पतन अब तक हुआ है वह
निस्सीम है और वह हमें अन्यथा सोचने पर विवश करता है। कवि ‘आजादी’ शीर्षक कविता में कहता है-
‘कहाँ बदला कुछ
राजाओ के रंग बदल गए
भाषा वही है
सत्ता का चेहरा बदला
चरित्र नहीं
निरंकुशता समाप्त नहीं हुई
हिटलर ने मुखौटै पहन लिए बस”
सुभद्रा कुमारी चैहान की एक
प्रसिद्ध कविता है- ‘वीरों का बसन्त’। इसकी कुछ काव्य-पंक्तियाँ इस प्रकार हैं-
‘भूषण अथवा कवि चन्द नहीं।
बिजली भर दे वह छन्द नहीं।
है कलम बॅंधी स्वच्छन्द नहीं।
फिर हमें बताये कौन
हन्त।
वीरों का कैसा हो
बसन्त।’
इस कविता की पंक्ति ‘है है कलम बॅंधी स्वच्छन्द नहीं’ ध्यानव्य है।
अंग्रेजो के शासन काल में लेखन स्वतंत्र नहीं था। सरकार के विरुद्ध लिखना देशद्रोह
माना जाता था। आज संविधान की ओर से तो अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य है परन्तु अभ्यास
में ऐसा नहीं है। सरकार के विरुद्ध लिखने पर लेखक अथवा प्रकाशक को टारगेट किया जा
सकता है। इस दर्द को भी कवि ने अपनी कविता ‘शब्द’ में बखूबी उतारा है। यथा-
‘लेकिन शब्द हैं कि बोलते नहीं
उन्हें इंतजार है कवि का
उठाए कलम
लिख दे उन्हें
फटे कागज के टुकड़े पर
और वे चीख पड़ें
पर वह कवि
मजबूर है
काट दिए गए हैं
उसके हाथ
शाहजहाँ द्वारा”
समाज में जो आज असंगति है, भ्रष्टाचार है, वैषम्य है, अराजकता है, राजनीति का क्षरण है और इनके कारण लोक जीवन में जो कुंठा, निराशा, भुखमरी और दैन्य है उससे तो यही प्रतीत
होता है कि वास्तव में ईश्वर नाम की कोई चीज है भी अथवा नहीं और यदि वह जगत
नियन्ता वास्तव में है तो कहाँ सो रहा है। ‘ यदा यदा हि धर्मस्य
ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥’ का उद्घोश करने वाले कृष्ण और ‘जब जब होय धर्म के
हानि। बाढ़े असुर अधम अभिमानी।। तब तब प्रभु धरि विविध शरीरा। हरहिं कृपा निधि
सज्जन पीरा।।’ वाले राम, कहाँ हैं या पाप का
घड़ा अभी पूरा भरा नहीं। कवि बृजेश नीरज ‘राम कहाँ हो’ नामक कविता में इसी प्रश्न को उठाते हैं।
‘धन-शक्ति के मद में चूर
रावणके सिर बढ़ते ही जा रहे हैं
आसुरी प्रवृत्तियाँ
प्रजननशील हैं
समय हतप्रभ
धर्म ठगा सा है आज फिर
राम ! तुम कहाँ हो?”
‘कोहरा सूरज धूप’ काव्य में ऐसी ही
अनेक मार्मिक कविताएँ हैं परन्तु उन सबका उललेख कर पाना इस संक्षिप्त लेख में संभव
नहीं है। किन्तु कुछ कविताएँ जैसे- ‘तीन शब्द’, ‘जमीन’, ‘प्रश्न’, ‘उस समंदर तक’, ‘चेहरे’, ‘आस’, ‘दम तोड़ देगी’, ‘मित्र के नाम’, ‘हाथी’, ‘वह सड़क बन्द है’,
‘दीवार’, ‘जागोगे तुम’, ‘खोज’ और सबसे विशेष ‘अर्थ’ आदि अनेक ऐसी कविताएँ हैं जो हृदय को तो झकझोरती ही हैं परन्तु इनके
झरोखों से निकट भविष्य में एक पुख्ता कवि के आने की आहट मिलती है।
- डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव
ई एस-1ध्436, सीतापुर रोड योजना
अलीगंज, सेक्टर-ए, लखनऊ।
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